(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.181. अध्यायः 181
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
भरद्वाजंप्रति भृगुणा मेरुस्थब्रह्मणा जलादिभूम्यन्तसृष्टिप्रकारकथनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भरद्वाज उवाच। 12-181-0x(5919)(72289)
मेरुमध्ये स्थितो ब्रह्मा कथं स ससृजे प्रजाः।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व याथातथ्येन पृच्छतः॥ 12-181-1(72290)
भृगुरुवाच। 12-181-2x(5920)
प्रजाविसर्गं पूर्वं स मानसो मनसाऽसृजत्।
संरक्षणार्थं भूतानां सृष्टं प्रथमतो जलम्॥ 12-181-2(72291)
यत्प्राणः सर्वभूतानां वर्धन्ते येन च प्रजाः।
परित्यक्ताश्च नश्यन्ति तेनेदं सर्वमावृतम्॥ 12-181-3(72292)
पृथिवी पर्वता मेघा मूर्तिमन्तश्च ये परे।
सर्वं तद्वारुणं ज्ञेयमापस्तस्तम्भिरे हि ताः॥ 12-181-4(72293)
भरद्वाज उवाच। 12-181-5x(5921)
कथं सलिलमुत्पन्नं कथं चैवाग्निमारुतौ।
कथं वा मेदिनी सृष्टेत्यत्र मे संशयो महान्॥ 12-181-5(72294)
भृगुरुवाच। 12-181-6x(5922)
ब्रह्मकल्पे पुरा ब्रह्मन्ब्रह्मर्षीणां समागमे।
लोकसंभवसन्देहः समुत्पन्नो महात्मनाम्॥ 12-181-6(72295)
तेऽतिष्ठन्ध्यानमालम्ब्य मौनमास्थाय निश्चलाः।
त्यक्ताहाराः पवनपा दिव्यं वर्षशतं द्विजाः॥ 12-181-7(72296)
तेषां ब्रह्ममयी वाणी सर्वेषां श्रोत्रमागमत्।
दिव्या सरस्वती तत्र संबभूव नभस्तलात्॥ 12-181-8(72297)
पुराऽस्तमितनिःशब्दमाकाशमचलोपमम्।
नष्टचन्द्रार्कपवनं प्रसुप्तमिव संबभौ॥ 12-181-9(72298)
ततः सलिलमुत्पन्नं तमसीवापरं तमः।
तस्माच्च सलिलोत्पीडात्समजायत मारुतः॥ 12-181-10(72299)
यथा भाजनमच्छिद्रं निःशब्दमिह लक्ष्यते।
तच्चाम्भसा पूर्यमाणं सशब्दं कुरुतेऽनिलः॥ 12-181-11(72300)
तथा सलिलसंरुद्धे नभसोन्ते निरन्तरे।
भित्त्वाऽर्णवतलं वायुः समुत्पतति घोषवान्॥ 12-181-12(72301)
स एष चरते वायुरर्णवोत्पीडसंभवः।
आकाशस्थानमासाद्य प्रशान्तिं नाधिगच्छति॥ 12-181-13(72302)
तस्मिन्वाय्वम्बुसंघर्षे दीप्ततेजा महाबलः।
प्रादुर्बभूवोर्ध्वशिखः कृत्वा निस्तिमिरं नभः॥ 12-181-14(72303)
अग्निः पवनसंयुक्तः स्वात्समुत्क्षिपते जलम्।
सोऽग्निमारुतसंयोगाद्धनत्वमुपपद्यते॥ 12-181-15(72304)
तस्याकाशान्निपतितः स्नेहस्तिष्ठति योऽपरः।
स संघातत्वमापन्नो भूमित्वमनुगच्छति॥ 12-181-16(72305)
रसानां सर्वगन्धानां स्नेहानां प्राणिनां तथा।
भूमिर्योनिरिह ज्ञेया यस्यां सर्वं प्रसूयते॥ ॥ 12-181-17(72306)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 181॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-181-3 यत् जलम्। तेन जलेन॥ 12-181-4 वारुणं वरुणदेवतासंबन्धादाप्यमित्यर्थः। मूर्तिमत् मनुष्यपश्वादिविग्रहवत्। आप्यत्वे हेतुः। आपस्तस्तम्भिरे यत आपस्तम्भं धनीभावं पृथिव्यादिरूपं प्राप्ताः॥ 12-181-6 ब्रह्मकल्पे ब्रह्मप्रथमदिने। लोकानां संभव उत्पत्तिस्तत्र विषये संदेहः॥ 12-181-8 तेषां धर्ममयीति ट. ड. पाठः॥ 12-181-9 सरस्वतीमेवाह पुरेति। स्तिमितमाकाशमनन्तमिति झ. पाठः॥


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